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Wednesday, November 30, 2011

Me Ashamed!



When
I first saw her
she was bare
I snuggled
thereon
bare-chested
she fed me
I felt
she was proud of
and me
contented
growing.


I mumbled through her
bit
kissed over her thoroughly
as we lied naked
she never tasted
different
from toe to head
I felt
she was playful
and we
both children expressive
innocent.
as we grew
I felt
things changed
as the notions
the world around us.
veiled
she could never hid
her parts
grow differently
as puerile tongue
always tried
lick over
I felt
be clothed
she’s unsecure
frightened.


And me
who witnessed
her bare proud
has crawled through
her undefined parts
is ashamed
is to decry
what really made the difference
her growing
essence to hide
or the eyes wide open!


Friday, November 18, 2011

तुम...

चलते-चलते तुम मिले थे
चलते-चलते बिछड़ गये
क्या है गम
तुम साथ नहीं हो
साथ है यादें मेरे
यादें तेरी मेरा हिस्सा
फिर कैसे तुम मुझसे जुदा

घोर उदासी में भी आकर
मेरे बालों को सहलाकर
भीगी आँखें पोछती तुम
साँस थमाती गले लगाकर
हसती तुम फिर खिलखिलाकर

सपने मेरे जिंदा रहें
जीवन मेरा सजा रहे
होठों पर हर दम हँसी
चांदनी मुख पर रहे
यही तो सपना तेरा
यही तो जीवन तेरा
अजीब कहानी हो तुम
एक अँधेरी रौशनी तुम!



Tuesday, November 15, 2011

मैं...


मैं जानता हूँ
मैं झोपडी सा
तिनकों-तिनकों से जुड़ा हुआ
जड़ें जमीं में
सिर हवा में
आंधी भी होगी
बारिश भी होगी
अगर
अस्तित्व मेरा लगे डगमगाने
और जड़ें
हिलने लगे
मेरे आदर्शों को
कोई कुछ ना बोले
वो तो
वहीँ हैं
वही रहेंगे
वो मैं हूँ
जो झेल सका ना
आंधी और बारिश
अगर
कभी ये हो गया तो
वो हार मेरी
वो मैं हूँ हारा!


Friday, November 11, 2011

दिन और रात


दिन में
रात में
कुछ खास है
दोनों में कुछ सांठ-गांठ है


दिन में
आँखें चुन्धियाई
चाँद  ने
आके आँख मिलाई
तेज धूप ने
जो जलन दी
ठंडी  चांदनी
आकर सहला गई
दिन के उजाले ने
चकनाचूर कर दिया था
जिस स्वप्न को
रात फिर से लग गयी
उसी  स्वप्न को बुनने को


एक और
अजीब  बात हो गयी
दिन में
रात में
एक भीड़ में
अकेला घूमता रहा था
दिन भर
रात को साया भी कहीं
ढूंढे ना मिला!


Thursday, November 10, 2011

उस रात...

उग आये थे
मेरे बिस्तर पर
कांटें
धोकनी हो गयी थी
सांसें
सूखकर
जम गई थी
पलकें
उस रात
जब तुम
फिर आई थी
बिखर गई
मानस पटल के टूटे आइनों  पर
और
तुम्हारी हँसी
बार-बार
टकरा रही थी सुन्न कानों से

उस रात
खुली आँख के कोरों से
बह गए थे
सैकड़ों  पल
और
मेरे अस्तित्व पर फैली
एक विशाल दास्तान
सिमट गई थी
तकिये
के भीगे कोनों पर!



Monday, November 7, 2011

Let’s redraw our sky!



Let’s depart for a while
to assure
my mind
that
you still make my heart
 still live as my part
and that
you still run in my blood.



To see
how much you mean to me
how the world without you seem to me
and that
without you how much 'me' mean to 'me'.


To roam
alone in the crowd
to moan
alone in the night
to scorn
alone at the sky
to mourn
alone over the plight



Then you come again
pat me on my back
peep deep in my wet eyes
to see our redrawn sky.


Lets depart for a while
to be warm again in our arms
to put torn vibes to calm
and to cherish our redrawn sky!



Saturday, October 29, 2011

हर साख पे पत्ते नहीं होते!


छाव है तो धूप भी होगी कहीं
हर साख पे पत्ते नहीं होते

दामन से छिटक गए कुछ तारें, अफ़सोस कैसा
चंद तारों के टूटने से आसमां खली नहीं होते

जो अपने है तो वो दूर जाएँगे कहाँ
जो चले गए वो अपने नहीं होते

क्या पता किस-किस ने पकड़ी ये ऊँगली कब, कहाँ तक
उंगलियों पर उंगलियों के निशान नहीं होते

दो आंसु उनके लिए भी, जिनके हम कोई ना थे
कुछ बुंदो से समुंदर खाली नहीं होते!



Friday, October 21, 2011

केवल इसलिए नहीं


केवल इसलिए नहीं
की
मैं देखना चाहता हूँ
तुम्हारे चेहरे को
मुस्कराता हुआ
मन को उछलता हुआ
इसलिए भी
की
कम से कम
इतना तो
मैं भी चाहता हूँ
कि तुम रहो
मेरे पास
मेरे साथ
कुछ ओर…
पल को


Wednesday, October 19, 2011

शायद मैं तुम्हे पहले से जानता हूँ!


इधर-उधर से
सुनकर
जानकर
अनजाने ही
तुम्हारे बारे में
मैंने कुछ लकीरे तय की 

अपनी  
भावनाओं
इच्छाओं के रंगों से
सजाकर
मैंने
तुम्हारी तस्वीर बनाई

शायद  
तुम्हे पता नहीं है
की हम
कितनी ही रातें
खेलते
हस्ते
खिलखिलाते
रहे है
इकठ्ठा

और  
हम जब मिले
बाहर
जहाँ
पुतले होते है
तस्वीरे
नहीं होती
मैं अवाक था
तुम हुबुहू
मेरी तस्वीर जैसे थी

उस वक़्त तक
कहाँ
देख पाया था मैं
तुम्हारी आँखों के कोने में छिपे
समाज को
और कहाँ
हावी हो पाया था
समाज
खुद मुझ पर

शायद
तुम्हे याद ना हो
तुमने  
नजरे झुका ली थी
और
मैं
स्तभ था
पल में
बहुत अपने से
अनजाने हो जाने  की
प्रक्रिया पर!


Friday, October 14, 2011

मोम के सायें...

यू ही
भटकते कहीं मिल जाते हैं
कभी राह में
कभी पड़ाव पर
कभी धूप में
कभी छाव में
कभी डूबते सूरज से कूदते चाँद में
लुप्त होते चाँद से उदय होते सूर्य में
यू ही
छिटक जाते हैं
कभी इस मोड़ पर
कभी उस छोर पर
कभी अंध में
कभी धुंध में
कभी फैलते कोहरे से गहराते अँधेरे में
कभी गहराते  अँधेरे से फैलते कोहरे में
यू ही
भूले-भटके से चले आते हैं
कभी अकेली शाम को  
कभी तन्हा रात को
कभी पलटते पन्नों पर
कभी उघडती परतों पर
कभी शुष्क होठों से गीली पलकों पर
कभी गीली पलकों से शुष्क होठों पर
यू ही  
कभी पिघल जाते हैं
आंसुओ में
कभी  जम जाते हैं 
ख्वाबों में
मोम के सायें!   

Thursday, October 13, 2011

कुछ वक़्त की लकीरों...

कुछ  वक़्त  की  लकीरों  के  मायने  गलत  निकलें
कुछ  हकीकतो  के  अर्थ गलत  निकलें
जिंदगी  पसरती  रही  आँचल  अपना
कुछ खवाब गलत निकलें
कुछ अंदाज़ गलत निकलें

यु ही तीर-तुक्को के बीच
चुक गए निशाने कई
दमन हवाओ का उड़ता रहा यु ही
कभी हवा हमसे चुक गयी
कभी हम हवा से चुक गए

कितना कुछ कहना  
कितना कुछ सुनना
और ना जाने
क्या-क्या रह गया
हम देखते ही रह गए
और ये वक़्त
ना जाने
क्या से क्या कह गया

Tuesday, October 4, 2011

फिर क्यों...???

भीड़ में भी जैसे
ढूँढती सी खुद को नज़र आती हो
उलझी सी अपनी उलझी जुल्फों सी
क्यों कभी डरे ख्वाब सी नज़र आती हो
उड़ने को बेताब कभी
और कभी रूकने को तरसती नज़र आती हो
कभी हवा में हवा
कभी बूँद में बूँद 

फिर क्यों कभी ठहरे पानी सी नज़र आती हो!
तुम खुश  हो जानते है सभी
फिर क्यों कभी सबसे भीगी आंखें चुराती नज़र आती हो!

Sunday, September 11, 2011

मैं कुछ कुछ ज़िन्दगी सा हूँ!


कभी सांझ सा ढलता
दोपहर सा जलाता कभी
कभी तारों सा टिमटिमाता
और रात सा बहकता कभी
चाँद सा खोया कभी
तो सुबह सा जगाता कभी
मैं कुछ कुछ ज़िन्दगी सा हूँ!

फूल सा महकता कभी
धुल सा भटकता कभी
हवा सा बहता कभी
और पत्ते सा ढहता कभी
बारिश सा भीगता कभी
और बर्फ सा गिरता-जमता कभी
मैं कुछ कुछ ज़िन्दगी सा हूँ!

हर चीज़ से हैरान कभी
हर शख्स से अनजान कभी
कभी दौड़ता शैतान सा
और शांत कभी सुनसान सा
कभी चीखता-चिल्लाता मैं
कभी खामोश बेजुबान सा
मैं कुछ कुछ ज़िन्दगी सा हूँ!

कभी मोम सा पिघलता मैं
कभी कठोर चट्टान सा
कभी चहकता बाज़ार सा
कभी बंद गली के मकान सा
कभी हर किसी के साथ सा
और कभी बिना किसी पहचान मैं!

कभी संकरी गली सा
कभी खुला मैदान मैं
कभी ग़म सा भरा भरा
कभी सिसकियों का तूफ़ान मैं
कभी महफ़िल सा हरा हरा
और कभी तनहा बेजान मैं
मैं कुछ कुछ ज़िन्दगी सा हूँ!





Thursday, September 1, 2011

Let she be her...


She never resisted.
While
the brushes of a painter
unveiled
her secrets
coloured
her highs dark
and
her body twisting
she never screamed
when brushes
refused to go
beyond her body
and
lustful sights
squelched through
her tearful eyes.

While
a poet
dug into
her beauty-treason
sailed through
her deep watery eyes
swung with
her silky hair
zoomed with
her leveled hips
she never cried
when
the pen
refused to move
slightly inside.

While
a crowd
chained her
wrapped her in toe to head
black coffin
she never protested
when
She was hunted
ate
drunk
torn
and thrown.


At least once
let her to discover
herself
beyond pen
brush
crowd
where
she delves
where
she means
a human
a cluster of emotions
a hoard of images
a bunch of aspirations
let she be her
a sky
a earth
and a dream!

कभी-कभी यू ही...

बहुत वक़्त गुजारा है
रात को
इन हाथो में
संभाले हुए
उन खुशनुमा पलों की तलाश में
कभी-कभी यू ही
चाँद के चेहरे पर
अपनी उंगलियों के निशान ढूंढता हूँ

अचानक ही हो गया ये सब
उस आंधी से पहले
शायद तुमने कहा था कुछ
उन गुमशुदा शब्दों  की तलाश में
कभी-कभी यू ही
हवाओं की सरसराहट में
तुम्हारे सुरों की झंकार ढूंढता हूँ

धुप निकली तो
अँधेरे गए
कुछ ख्वाब गए
उस वाष्पित एहसास की तलाश में
कभी-कभी यू ही
बादलो की आकृति में
अपने आकाश का विस्तार ढूंढता हूँ

जरा सी चोट लगी
टूट गए
बिखर गये
उस बिखरे कांच की तलाश में
कभी-कभी यू ही
दिल में झाँक कर
आइनों के चेहरे में बिकार ढूंढता हूँ 

कभी बह न सके
जम गये
सुख गये
उन गमजुदा बूंदों की तलाश में
कभी-कभी यू ही
भीगी आँख के कोनो में
ज़ज्बातो के सैलाब ढूंढता हूँ

ईमारत आलिशान थी
ढहे गयी
गिर गयी
उस रहनुमा कल की तलाश में
कभी-कभी यू ही
खंडर की दीवारों पर
अपने अतीत का सामान ढूंढता हूँ!


Monday, August 22, 2011

अन्ना, तुम डरना मत!

वो आयेंगे
कभी बाण
कभी कृपाण
कभी ढाल लेके,
कभी सुनहरी ज़िन्दगी के सपने
कभी मौत का सामान लेके,
मनाएंगे
बरगालायेंगे
डरायेंगे कभी
अन्ना, तुम डरना मत!

आएगी
रात काली कभी
रूप विकराल लेके
कभी दिन चढ़ेगा
सब साजो सामान लेके,
सांझ की शान्ति डराएगी कभी
कभी सुबह
डराएगी नयी पहचान लेके
अन्ना, तुम डरना मत!

भूख तो भूख है  
सताएगी कभी
आँखों में अँधेरा सा
अंगो में सिकुडन लाएगी कभी,
सूखे होठों पे
करेगी निराशा तांडव
और कानो पे छा जाएगी
ख़ामोशी कभी,
ये जंग है
आएगी सब रंग
सब तूफ़ान लेके
अन्ना, तुम डरना मत!

दूर वहाँ
रात के पार
कोई बुलात्ता है
हमारे ना सा होने पर
बेबस चिलाता है,
बैठा किसी कोने में
सुबकता है कभी
कभी बेतहासा
अंधेरे के आर-पार दौड़ लगाता है,
एक देश
एक समाज
अन्ना, तुम्हे बुलाता है! 

तुमने जगाया है हमें
अहसास हमारे होने का
कराया है हमें
देखो
सड़क के आर-पार
हर गली
चौराहा
हर बाज़ार
बच्चा बूढा
हर जवान
बहने को तैयार है  नसों में तेरी
अन्ना, तुम डरना मत! 




Sunday, August 21, 2011

थोड़ी-थोड़ी सबसे खफा है जिंदगी!


हर हादसे की गवाह
नहीं होती है
हथेलिया
गहरे ज़ख्मो के निशाँ
जिस्म पर नहीं होते
कभी लड़खड़ा कर
तो कभी फिसलकर भी
गिर सकते है राहगीर
हर ठोकर के जिंम्मेदार
पत्थर नहीं होते


हर कोने में
जला कर रखो दीप कोई
अंधेरो में
परछाइयां नहीं ठहरती
हर ज़ज्बात का
अंजाम नहीं आसू
खारे पानी से कुछ
तन्हाईयाँ नहीं घुलती


हर चेहरे पे है
निशान जुदा-जुदा
हर आइने पर
धुल नहीं होती
क्या गिला
तू अकेला नहीं है
सेहरा में
थोड़ी-थोड़ी सबसे खफा है जिंदगी!


Saturday, August 20, 2011

इस शहर में...

इस शहर में
भूख है
बहुत
गरीबी है 
विशाल महलो में
सजे मंदिरों में
जगमगाती सडको पर
फुटपाथो पर
दिलो में
दिमागों में

इस शहर में
चमक है
बहुत
रौशनी है
पुते चेहरे पर
जलती निगाहों में
पसीने  की बूंदों में
सजे बाजारों में
शहर पार के झोपड़ो में



इस शहर में
शोर है
बहुत
धमा चोकड़ी है
श्रृंगारित सांस्कृतिक केन्द्रों में
आलीशान समाजिक नजारों में
भीड़ भरे नुक्कड़ो पर
जिंदगी की कतारों में
दहशत के पदर्शन पर

इस शहर में
सभ्यता है
बहुत
संस्कृति है
विविध समारोहों में
अवांछित विचारो में
श्रृंगारो में
हर तरह की ज़िन्दगी के  अदभुत नजारों में
बंद दरवाजो में
संवेदानाओ में
आडम्बरो में 
मानवता के विभिषक पर्चारो में


इस शहर में
और है
बहुत
कुछ और भी है
घुटन है
जलन है
तड़प है
सिसक है
सूखे जिस्म है
फैलते शरीर है
चीखे है
कराहटे है
स्वार्थ है
पाप है
झूटे आसू है
सूखे बोल है
छल है
कपट है

इस शहर में
वो सब है
जो जमीन पर है
और जो आसमान पर नहीं!

Tuesday, August 16, 2011

मै...


मै
एक आइना
शायद
कोई
जादुई आइना


बहुत से
चेहरे
जो
बहुत अपने
बहुत
जाने-पहचाने
थे कभी
अब
आकर
मेरे सामने
खड़े हो जाते है

मै
उन्हें
पहचान
नहीं पता हूँ
कोई खुद को
मेरी
माँ बताता है
कोई...
और कोई...
फिर
वो सब
चेहरे
कभी
आँखों से आसू भर कर
कभी गुस्सा भर कर
कभी चिल्लाकर
और
डराकर कभी
देखना
चाहते है
वो तस्वीरे
जो मेरे
वश में नहीं बनाना
उनको दिखाना

मै
स्तब्ध
देख रहा हूँ
बद्तले चेहरों
के नाटक को
और
जी-तोड़
प्रयास
कर रहा हूँ
अपने
अस्तित्व
को
बनाये
या
बचाए रखने का


साथ ही साथ
दे
रहा हें मै
दिलासा
खुद को
रिश्तो को
झूटे
ना
होने की
और
जानता भी हूँ
की झूटी दिलासे
टूट
जाती है
हलके से
झोखे से ही
राइ के पहाड़ की तरह!